सेवा (स्वाश्रयी महिला सेवा संघ) श्रमजीवी बहेनों का संगठन है। सेवा का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को पूर्ण रोजगार और स्वावलंबन प्राप्त करने में सहयोग देना है।
आज सेवा गुजरात के १८ जिलों और भारत के २१ राज्यों में कार्यरत है। भारत के अलावा सेवा अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, मालदीव और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी महिलाओं के साथ कार्य कर रही है।
सेवा की सदस्य महिलाएँ घर-आधारित कामगार, फेरीवाली, उत्पादक, हस्तशिल्पकार, कृषि मज़दूर, सेवा प्रदाता तथा अनेक अन्य व्यवसायों से जुड़ी हैं। अपने अधिकारों, आजीविका और आत्मनिर्भरता के लिए संगठित हुई लाखों महिलाएँ आज सेवा के मजबूत परिवार का हिस्सा हैं।
प्राचीन काल से ही संगीत हमारे समाज और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। विशेष रूप से भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में संगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों के जीवन से जुड़ा रहा है। जन्म हो, विवाह हो या जीवन की अंतिम विदाई - हर अवसर पर गीत हमारी परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
चारण, देवीपूजक, गढ़वी तथा अन्य लोकसमुदायों ने दुहा, छंद, सोरठा और लोकगीतों के माध्यम से हमारे इतिहास, संस्कृति और जीवन-मूल्यों को जीवित रखा है। गोकुल में भगवान श्रीकृष्ण के रास से लेकर गुजरात के गरबा तक, संगीत भक्ति, आनंद और सामूहिक जीवन की सुंदर अभिव्यक्ति रहा है।
वर्षों से गाँवों में प्रस्तुत की जाने वाली भवाई जैसी लोककलाएँ भी यह दर्शाती हैं कि संगीत हमारे दैनिक जीवन, परंपराओं और सामाजिक संस्कृति से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ है।

सेवा ने हमेशा महात्मा गांधी के जीवन-मूल्यों और विचारों का अनुसरण किया है। इसलिए सेवा के हर दिन की शुरुआत प्रार्थना से होती है। यह प्रार्थना किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी धर्मों और मानवता के मूल्यों का सम्मान करती है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि "प्रार्थना आत्मा का आहार है।" सेवा का विश्वास है कि प्रार्थना के साथ दिन की शुरुआत करने से मन को शांति, भीतर से शक्ति और कार्य के लिए नई दिशा मिलती है।
संगीत सेवा की बहनों के लिए संदेश पहुँचाने और एक-दूसरे से सीखने का एक सशक्त माध्यम भी है। पानी बचाना हो, भूमि का संरक्षण करना हो, अन्न और ऊर्जा का सही उपयोग करना हो या पर्यावरण की रक्षा करनी हो - महिलाएँ अपने गीतों के माध्यम से इन संदेशों को अपने समाज तक पहुँचाती हैं। गीतों के माध्यम से वे अपने गाँव, मोहल्ले और समुदाय की अन्य महिलाओं से जुड़ती हैं, संवाद करती हैं और सामूहिक जागरूकता का निर्माण करती हैं।
इसी प्रकार, चाहे महिलाएँ खेतों में काम कर रही हों, नर्सरी में पौधे तैयार कर रही हों, कढ़ाई-बुनाई कर रही हों या तेज़ धूप में नमक के खेतों में श्रम कर रही हों - उनके होंठों पर अक्सर गीत गूंजते रहते हैं। उनके लिए श्रम और संगीत अलग-अलग नहीं हैं; श्रम में ही लय है और संगीत उनके रोज़मर्रा के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।
चाहे गाँव हों या शहर, महिलाएँ त्योहारों, मेलों और सामाजिक आयोजनों को गीत और संगीत के साथ उत्साहपूर्वक मनाती हैं। उसी प्रकार सेवा की बैठकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और विभिन्न आयोजनों का समापन भी अक्सर गीतों के साथ होता है। इससे महिलाओं के बीच एकता, आनंद और नई ऊर्जा का संचार होता है।

समय के साथ संगीत सुनने और उसका आनंद लेने के तरीकों में बहुत बदलाव आया है। एक समय था जब लोग गाँव के मेलों, भजन मंडलियों और रेडियो के माध्यम से संगीत सुनते थे। बाद में कैसेट, सीडी और अब मोबाइल फोन तथा इंटरनेट के माध्यम से संगीत आसानी से हर व्यक्ति तक पहुँचने लगा है।
इस बदलाव से संगीत की पहुँच तो बढ़ी है, लेकिन इसके साथ हमारी पारंपरिक लोकसंगीत परंपरा भी प्रभावित हुई है। आज अनेक स्थानों पर लोकगीत धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं और उनकी जगह फ़िल्मी संगीत अधिक प्रचलित हो गया है।
सेवा का मानना है कि हमारी लोकसंगीत परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। वर्षों से सेवा अपने संस्कार केंद्रों, सामुदायिक केंद्रों और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से पारंपरिक कला और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास करती रही है।
इसी दिशा में श्रमगान की शुरुआत की गई है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक गायकों, लोककलाकारों और संगीत की इस समृद्ध परंपरा को जीवित रखने वाली बहनों की पहचान करना, उनकी प्रतिभा को प्रोत्साहित करना और उनकी रचनाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना है।

आज के समय में यह पहल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि सेवा अब दूसरी और तीसरी पीढ़ी की युवा महिलाओं के साथ भी निरंतर जुड़ रही है। इन युवा महिलाओं के सामने आजीविका और रोजगार से जुड़ी अनेक चुनौतियाँ हैं। संगीत उनके कौशल को पहचानने, विकसित करने और नए अवसर प्रदान करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।
संगीत के माध्यम से महिलाएँ अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए आजीविका के नए अवसर भी प्राप्त कर सकती हैं। वे अपनी कला को निखार सकती हैं, अपनी आय बढ़ा सकती हैं और साथ ही अपनी लोकपरंपराओं को भी जीवित रख सकती हैं।
यह विचार सेवा के मूल दर्शन से जुड़ा हुआ है, जहाँ महिलाएँ केवल श्रमिक नहीं, बल्कि अपने कार्य की उत्पादक, प्रबंधक और स्वामिनी बनती हैं।

श्रमगान केवल गुजरात या भारत तक सीमित नहीं है। सेवा का प्रयास दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों की महिलाओं को संगीत के माध्यम से एक-दूसरे से जोड़ना है, ताकि उनकी लोकसंगीत परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन किया जा सके।
अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में भी संगीत लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। प्रत्येक देश और क्षेत्र की अपनी विशिष्ट संगीत परंपरा है, जो उसकी संस्कृति, इतिहास और पहचान को दर्शाती है।
भारत की तरह इन देशों में भी संगीत लोगों के दैनिक जीवन, समाज और भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। श्रमगान के माध्यम से सेवा इन विविध संगीत परंपराओं को एक साझा मंच पर लाकर उन्हें एक-दूसरे से सीखने, सुनने और मिलकर मनाने का प्रयास कर रही है।

चाहे गाँव हों या शहर, संगीत हमेशा से लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। आज भी अनेक समाज और समुदाय अपने गीतों के माध्यम से अपनी परंपराओं, संस्कृति, इतिहास और जीवन-मूल्यों को जीवित रखे हुए हैं। गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि भावनाओं को व्यक्त करने, रिश्तों को मजबूत बनाने और समाज को एक सूत्र में जोड़ने का एक सशक्त माध्यम हैं।
'सेवा' में भी एकता, समानता और सामूहिक शक्ति के मूल्य महिलाओं को प्रदेश, धर्म, भाषा और व्यवसाय की सीमाओं से ऊपर उठाकर एक परिवार के रूप में जोड़ते हैं। उसी प्रकार संगीत भी लोगों को एक-दूसरे के निकट लाता है, आपसी समझ को बढ़ाता है और सौहार्द, सहयोग तथा सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करता है।
संगीत में ऐसी अद्भुत शक्ति है जो विविधताओं के बीच भी एकता का अनुभव कराती है और लोगों को एक-दूसरे के जीवन, संस्कृति और अनुभवों से जोड़ती है।

'सेवा' के लिए महिलाएँ और संगीत एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। श्रम में लय है, प्रकृति में ताल है और रोज़मर्रा के जीवन में संगीत समाया हुआ है। महिलाओं के श्रम, जीवन और भावनाओं में संगीत स्वाभाविक रूप से बहता रहता है।
श्रमगान इसी भावना को जीवंत बनाने का एक प्रयास है। यह महिलाओं को उनके गीतों, अनुभवों और संस्कृति के माध्यम से एक-दूसरे से जोड़ता है। यह पहल इस विचार को सामने लाती है कि श्रम केवल काम नहीं है, बल्कि उसमें सृजन, संवेदना, आनंद और संगीत भी समाहित हैं।
श्रमगान के माध्यम से सेवा का उद्देश्य केवल गीतों का दस्तावेज़ीकरण करना नहीं है, बल्कि महिलाओं की आवाज़, उनकी जीवन-यात्रा, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संजोना भी है। यह पहल नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने और दुनिया के सामने महिलाओं की प्रतिभा, रचनात्मकता और जीवन-दृष्टि को प्रस्तुत करने का भी प्रयास है। श्रमगान केवल गीतों का संग्रह नहीं है, बल्कि श्रम, गरिमा, संस्कृति, एकता और सामूहिक यात्रा का उत्सव है। यह महिलाओं की आवाज़, उनकी पहचान और उनके जीवन के संगीत को दुनिया तक पहुँचाने का एक जीवंत प्रयास है।
"जहाँ श्रम है, वहाँ संगीत है; और जहाँ संगीत है, वहाँ एकता, आशा और नई शक्ति है।"
